Wednesday, August 16, 2017

औरत को समझने के लिए हजार साल की जिंदगी चाहिए-देवताले

अब जब महाकवि चंद्रकांत देवताले की देह दिल्ली के एक शवदाह गृह में विलीन हो चुकी है तो फिर क्या शेष है जो हमें उनसे कनेक्ट करता है।  हम  उनके परिवार का हिस्सा नहीं और ना  ही हमारा उनसे रोज़ मिलना-जुलना था। जो जोड़ता है वह है उनकी लेखनी और उनका कवि-मन। वे जब भी लिखते मनवीय संवेदनाओं को स्पंदित कर जाते। ऐसी गहराई  कि कविता एक ही समय में चाँद, सूरज और फिर पूरा  आसमान हो जाती लेकिन फिर भी वे कहते कि मां पर नहीं लिख सकता कविता।क्योंकि मां ने केवल मटर, मूंगफली के नहीं अपनी आत्मा, आग और पानी के छिलके उतारे हैं मेरे लिए।  वे लिखते हैं
 मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को बदला है गिटार में
समुद्र को शेर की तरह आकाश के
पिंजरे  में  खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा
मां पर नहीं लिख सकता कविता

बीती सदी जब ढलान पर थी तभी मेरा परिचय ख्यात पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा ने कवि चंद्रकांत देवताले जी से करवाया। साल 95 -96 में वह  इंदौर भास्कर का परिसर  था। बड़े कवि  लेकिन लेकिन बच्चों -सा सहज सरल मन। वह दौर ढलान  का होकर भी बहुत बेहतर था जब अख़बार बेहतर परिशिष्टों के लिए साहित्यकारों, कलाकारों को याद करते थे। पत्रकार  शाहिद मिर्ज़ा साहब इस बात का हमेशा ख्याल रखते कि कैसे नई पीढ़ी को समकालीन रचनाकारों से रूबरू कराया जाए ताकि उनमें  सही समझ और पेशे के लिए सम्मान  का भाव पैदा हो। कभी व्यक्ति से मिलवाकर  तो कभी किताब, कभी कलाकृति भेंट में देकर वे मुस्कुराते हुए सेतुबंध का काम किया करते। इससे पहले मैं भूलूं कि  मैं देवताले  जी को याद कर रही हूँ,  मैं बताना चाहूंगी कि कविता कैसे एक भोले और सच्चे इंसान को नवाज़ती  है इसकी मिसाल थे देवताले जी।  कवि मन होना ही कुछ ऐसा है, दुनिया किसी भी रफ़्तार से बढ़ रही हो आपका इंसानी यकीन कभी नहीं डगमगाता। वह कभी मानवता का साथ नहीं छोड़ता। क्या हुआ जो अंत में शरीर जर्जर  हो रहा हो या याददाश्त किसी बियांबां में भटक रही हो। जो कागज़ पर उतर गया अटल है कायम है। हिंदी कविता को बड़ी ऊंचाई देनेवाला एक कवि ज़िंदा है हमेशा।

डेली न्यूज़ की साप्ताहिक पत्रिका खुशबू को एडिट करते हुए उनकी एक कविता छापकर मैं तो भूल ही गई थी। उन्हें एक छोटा सा चेक गया होगा पत्र की ओर  से। दफ्तर के लैंडलाइन पर उनका कॉल आया।  बच्चों के बारे में पूछा तो  मैंने कहा आपकी एक कविता यमराज की दिशा उनके नौवीं के हिंदी पाठ्यक्रम  में भी है। मैं बच्चों से आपको जल्द मिलवाऊंगी। यह मुलाकात नहीं हो सकी फिर भी बच्चे उन्हें जानते हैं समझते हैं अपने कवि
 से जुड़े हैं।
साल 95-96 की बात होगी। शाहिद मिर्ज़ा साहब को दीपावली को बोनस संस्थान  से मिला था। उन्होंने मित्रो के साथ मिलकर इंदौर में चंद्रकांत देवताले जी का कविता पाठ रखा। देवतालेजी ने बेहतरीन कविताएं सुनाईं। पत्रकार का अपने कवि को यूं सम्मान देना उस शहर की रवायत का हिस्सा रहा होगा शायद। मैं अपनी छोटी बहन के साथ वहां गई थी। पत्रकार और व्यंग्यकार प्रकाश पुरोहित जी भी वहां मिले। देखते ही बोले इसे क्यों बिगड़ रही हो अपने साथ।
चंद्रकांत देवताले  1936 -2017 
देवताले जी के  इंदौर स्थित संवाद नगर घर पर भी जाना हुआ। एक कवि बेहद सादगी के साथ अपने अकेलेपन में भी जीवन की रौशनी रचता है। तभी तो लेखिका स्वाति तिवारी लिखती हैं ,उन्हें निमंत्रण देना मतलब --सबसे पहले सवाल हाँ तो मैं क्या करूंगा आकर ? ये क्या ये ------कौन साहित्य में ? इसको क्यों बुलवा लिया ? फिर कहेंगे अच्छा देखता हूँ ---और फिर अक्सर आते ही ,बाद में कहते अच्छा हुआ कार्यक्रम ,अगली बार फिर बुला लेना मुझे याद रख के ---
  बाद में वे और शांति और सादगी के लिए थोड़ी दूर स्थित महाकाल की नगरी उज्जैन चले गए।  कवि शिव मंगल सिंह सुमन भी यहीं बसते थे। देवताले जी के कविता संग्रह हड्डियों में छिपा ज्वर से एक कवितांश
 फिर भी 
सिर्फ एक औरत को समझने के लिए
हजार साल की जिंदगी चाहिए मुझको
क्योंकि औरत सिर्फ भाप या बसंत ही नहीं है
एक सिम्फनी भी है समूचे ब्रह्मांड की
जिसका दूध, दूब पर दौड़ते हुए बच्चे में 
खरगोश की तरह कुलांचे भरता है
और एक कंदरा भी है किसी अज्ञात इलाके में
जिसमें उसकी शोकमग्न परछाईं 
दर्पण पर छाई गर्द को रगड़ती रहती है 



कवि के बारे में 
चंद्रकांत देवताले (जन्म १९३६) का जन्म गाँव जौलखेड़ा, जिला बैतूल, मध्य प्रदेश में हुआ। उच्च शिक्षा इंदौर से हुई तथा पी-एच.डी. सागर विश्वविद्यालय, सागर से। साठोत्तरी हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर देवताले जी उच्च शिक्षा में अध्यापन कार्य से संबद्ध रहे हैं। देवताले जी की प्रमुख कृतियाँ हैं- हड्डियों में छिपा ज्वर, दीवारों पर खून से, लकड़बग्घा हँस रहा है, रोशनी के मैदान की तरफ़, भूखंड तप रहा है, हर चीज़ आग में बताई गई थी, पत्थर की बैंच, इतनी पत्थर रोशनी, उजाड़ में संग्रहालय।



Monday, August 14, 2017

छलकाते रहे सिंधु का जल जो उनकी आँखों में था

सभी दोस्तों को आज़ादी की वर्षगांठ बहुत-बहुत मुबारक। आज़ाद होने का एहसास जब सत्तर  सालों  बाद भी हमें यूं स्पंदित कर देता है तो कल्पना  की जा सकती है कि उस दौर का आलम क्या रहा होगा। शायद उस दौर में विभाजन ने हमारी  खुशियों में सुराख़ किया था। मैं उन परिवारों से ताल्लुक रखती  हूँ जो मुल्क के विभाजन के बाद भारत आए। शरणार्थी परिवार। हमारे पुरखों के शब्दकोष में बस एक ही शब्द था संघर्ष। क्या स्त्री क्या पुरुष सबने इसी के आस-पास अपनी ज़िंदगी बुन ली थी।
ज़िन्दगी बढ़ती रही लेकिन इस कौम को किसी के आगे हाथ फैलाना मंज़ूर नहीं था। कठोर परिश्रम से  अपनी ज़िन्दगियों की सूरत बदलने की ज़िद उन्होंने  हमेशा जारी रखी। जारी रखा अपने बच्चों को बेहतर ज़िंदगी देने का संकल्प। किसी से कोई अपेक्षा नहीं। सरकार को  भी हमेशा  झुक-झुक कर इसलिए  धन्यवाद देते रहे कि उन्हें माँ भारती  की गोद  में शरण मिली। इसके अलावा  कोई मांग इस समुदाय  के भीतर मैंने तो नहीं देखी।  क्या उनका अपमान ना  हुआ होगा ? क्या उनकी संस्कृति, उनके स्थानीय भाषा बोलने के अंदाज़ ने उन्हें मज़ाक का बायस न बनाया होगा ?  फिर भी वे दूध में शकर की तरह घुलते रहे। छलकाते रहे सिंधु का जल जो उनकी आँखों में था। पुरखे सिंध को याद करते हुए इन सत्तर बरसों में  बिदा होते रहे। विरसे में छोड़ गए अपने दम  पर अपनी कौम के  कल्याणका मज़बूत इरादा ।  देशहित में  ये वाकई बड़ा योगदान होता है जब एक समाज अपनी मदद के  लिए किसी ओर नहीं ताकता। बुज़ुर्गों को मैंने हमेशा नतशिर ही पाया , इतने विनम्र और व्यवहार कुशल कि बजाय भिड़ने के हर  मामले को  शांति की ओर मोड़ देते। ऐसा आत्मनियंत्रण और संयम शायद सिंधु की ही देन  था। पांच हज़ार साल की सभ्यता के अंश को महसूस करना कोई सादा काम नहीं है लेकिन वह  पुरखों में नज़र आती थी।
विभाजन की कथा में दर्द  के सिवाय  होता भी  क्या है लेकिन सत्तर साल में कोई समाज कितनी  समरसता के साथ कितना आगे बढ़ा यह वक्त उस लेखे-जोखे का भी तो  है। 

Wednesday, May 24, 2017

ये नए किस्म के पत्थरबाज़

ये नए किस्म के पत्थरबाज़ हैं जो इंसानियत को पत्थर मार रहे हैं. रेश रावल, अभिजीत या फिर चेलापति कैसे भूल जाते हैं कि ये स्त्रियों से बात कर रहे हैं।  अपने आक्रामक ट्वीट और खासकर महिलाओं के खिलाफ भद्दी टिप्पिणयां करने के बाद ट्विटर ने गायक अभिजीत भट्टाचार्य के अकाउंट को सस्पेंड कर दिया है।अभिजीत ने अरुंधति को गोली से उड़ा देने की और जेएनयू छात्रसंघ की नेता शहला राशिद पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने लिखा था कि ऐसी अफवाह थी कि शेहला रशीद ने ग्राहक से २ घंटे के पैसे लिए और उसे संतुष्ट न कर सकी। तेलगु कलाकार चेलापति बोले की स्त्रियां बस बिस्तर पर ही ठीक हैं 

वे पिछले चार बरसों से एक बेहतरीन जोड़ा ही नजर आते थे। लव बर्ड्स  का जोड़ा। अब भी कुछ नहीं बदला है ना ही कुछ बिगड़ा है। दोनों के ही जीवन में यही कोई दो-तीन बरसों में समय कुछ बदल-सा गया है। दोनों में से एक को लगता है कि शायद वह तो था ही तंग सोच का पैराकार। ये तो बापू और नेहरू ने इरादतन हमें बड़ी सोच और बड़े सपने देखने की आदत डालनी चाही थी। हमने भी रंग तो बदन पर मल लिया लेकिन भीतर कुछ नहीं बदल सके। किसी ने पानी की बौछारें क्या छोड़ी हम तो पूरे धुल गए। जैसे बस  इस रंगीन केंचुली से मुक्त होने के लिए मौके के इंतजार में थे। यह केंचुली किसी जोड़े के साथी ने भी पहन रखी थी जो उतर गई। दूसरा साथी हक्का-बक्का है कि आखिर सच क्या है जो इतने साल देखा वह या जो अब है वह?
ऐसी कई केंचुलियां अब पीछे छूट रही हैं और लोग अनावृत्त हो रहे हैं। समझ नहीं आता कि क्या सच है क्या झूठ? कभी सोनू निगम तो कभी परेश रावल के जो बयान आते हैं बताते  हैं कि इतनी मधुर आवाज और इतने बेहतरीन अभिनेता के पास बोलने के लिए ऐसी बातें ही क्यों हैं? सोनू निगम ने अजान से चलकर मंदिर, गुरु द्वारे सबको दायरे में बांध दिया और अब परेश रावल ने लेखिका अरुंधति राय को लेकर एक बयान दिया है। परेश रावल ने एक ट्वीट किया, जो कश्मीर में आर्मी जीप से एक युवक को बांधकर घुमाने वाले मामले से जुड़ा है। उन्होंने अपने इस ट्वीट में लिखा है कि पत्थरबाज को जीप से बांधने से बेहतर है कि अरुंधति राय को बांधो। हालांकि ज्यादातर ने इस ट्वीट को हैरान करने वाला और हिंसक बताया है लेकिन इसे रीट्वीट भी खूब किया गया। आपको बता दें अरुंधति अक्सर कश्मीरियों और कश्मीर पर  बोलती हैं। हाल ही उन्होंने कहा था कि भारत कश्मीर में अगर 7 से 70 लाख सैनिक भी तैनात कर दे, तब भी कश्मीर में अपना लक्ष्य नहीं पा सकता। 
हरेक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। अरुंधति राय के बयान की भी होनी थी लेकिन क्या यह वाकई प्रतिक्रिया थी? पत्थरबाज को जीप से बांधने से बेहतर है कि अरुंधति राय को बांधो।  क्या यह हिंसक टिप्पणी नहीं है? या फिर 7 से 70 लाख सैनिक तैनात कर दें, तब भी भारत कश्मीर में अपना लक्ष्य नहीं पा सकता यह हिंसक है? हम में से कई को दूसरी टिप्पणी भी घातक लग सकती है क्योंकि यहां देश का नाम शामिल है। हाल ही में कश्मीरी युवक फारूक अहमद डार को आर्मी की जीप के बोनट से बांध कर घुमाया गया था। इस वीडियो के वायरल होने के बाद आर्मी ने जांच के आदेश दिए। बाद में फारूक  को जीप से बांधने वाले आर्मी के अधिकारी को क्लीन चिट दी गई। इसी संदर्भ में परेश रावल ने लिखा था कि यहां पत्थरबाज को जीप से बांधने से बेहतर है कि अरुंधति राय को बांधो।  जबकि उमर अब्दुल्लाह का ट्वीट कहता है कि  एक युवक को सेना की जीप से इसलिए बांधा गया ताकि पत्थरबाज जीप पर हमला ना कर सकें। परेश रावल पर लौटते हैं एक बेहतरीन अभिनेता और गुजरात से ही भाजपा के सांसद भी। समझना मुश्किल है कि इस दौर में हरेक को अपनी निष्ठाएं नए सिरे से क्यों परिभाषित करनी पड़ रही हैं। 
अरुंधति राय एक लेखिका हैं जिन्हें 1997 में गॉड ऑव स्मॉल थिंग्स के लिए मेन बुकर प्राइज मिल चुका है जो बाद में मामूली चीजों का देवता के नाम से हिंदी में भी प्रकाशित हुआ।जवाब में अरुंधति की शालीन टिप्पणी आई कि अगर मैं किसी विषय पर अपनी राय रख रही हूं और फिर उस पर लोगों की अपनी राय है। आप हर एक से यह उम्मीद नहीं रख सकते हैं कि वो खड़े होकर आपके लिए ताली बजाएंगे।  कोई बात नहीं जो हम अपने लेखक का सम्मान नहीं करते लेकिन कम अज कम अपने तर्क से तो उन्हें खारिज कर सकते है। हिंसा का विरोध ही तो दोनों तरफ का मकसद है। अगर जो परेश रावल को अपनी बात में दम नज़र आता तो यूं अपनी टिप्पणी को खुद ख़ारिज न करते। 
फिर भी लगता है कि  आस्था जाहिर करने की नई आंधी चली है जब पति-पत्नी ही एक दूसरे को नए सिरे से जान अचंभित है तो फिर हम-तुम कौन? इस आंधी को गहरे और बड़े पेड़ ही थाम सकते हैं। कहां है वे?