Monday, November 13, 2017

क़रीब-क़रीब सिंगल या ऑलमोस्ट मुकम्मल


क़रीब-क़रीब सिंगल पूरी तरह मुकम्मल मालूम फिल्म मालूम होती है। स्त्री-पुरुष के रिश्तों को इतने रोचक अंदाज़ में पिरोना कि देखनेवाला पूरे समय बस ठुमकती हुई हंसी हँसता रहे आसान नहीं है। इस गुदगुदाने के हुनर में इरफ़ान तो माहिर हैं ही पहली बार हिंदी फिल्म में नज़र आईं पार्वती भी कहीं उन्नीस नहीं  हैं। निर्देशक तनूजा चंद्रा हैं जिन्हें बरसों पहले से हम दुश्मन (फिल्म) के नाम से अपने ज़ेहन में बसाए हुए हैं पूरे 20 साल बाद फॉर्म में नज़र आई  हैं । इन बीस सालों में उनकी संघर्ष, सुर, ज़िन्दगी रॉक्स जैसी फ़िल्में आई लेकिन यह मनोरंजन की नई परिभाषा गढ़ती हैं। प्यारे से रिश्ते के अंकुर फूटने से पहले का मनोरंजन। इरफ़ान के अभिनय जितनी ही सरल सहज है क़रीब क़रीब सिंगल लेकिन जिस किरदार पर मेहनत हुई है वह जया का है। स्त्री होने के नाते तनूजा ने इस किरदार को बहुत ही बेहतरीन रंग दिया है। एक विधवा जो पति के नाम को पासवर्ड बनाकर अब भी उसी की यादों में जी रही है। योगी (इरफ़ान) यहीं तंज़ कसता है कि तुम लड़कियों का अजीब मामला है पति साथ रहे तो सरनेम वर्ना पासवर्ड।
शौक से कवि और पेशे से फक्कड़ योगी और पेशे से बीमा अधिकारी और स्वाभाव से गंभीर जया एक डेटिंग साइट पर मिलते हैं और जब दूसरी मुलाकात में ही कवि महोदय शेखी बघारते हैं कि उनकी तीन गर्लफ्रेंड्स रही हैं और आज तक वे सभी उनकी याद में आंसूं बहा रही हैं  तो जया को बिलकुल यकीन नहीं आता। योगी वहीँ उन्हें सच्चाई को परखने की चुनौती देता है। गर्लफ्रेंड्स से मुलाकातों का यह सफर ऋषिकेश ,जयपुर  और गैंगटोक होता हुआ बहुत ही दिलचस्प बन जाता है। और ये दो एक दूसरे से उलट किरदार कई मज़ेदार मंज़र पैदा करते हैं। योगी दुनिया और इसके लोगों से प्यार करनेवाला बंदा है और जया बंद ख़याल जिसे डेटिंग साइट पर जाने से भी घबराहट होती है।
क़रीब-क़रीब सिंगल को तनुजा चंद्रा की मां कामना चंद्रा ने लिखा है। वही कामना चंद्रा  जिन्होंने चांदनी , 1942 अ लव स्टोरी और प्रेम रोग लिखी है। गीत संगीत अच्छा है लेकिन जो मुझे याद रहा वह बड़े अच्छे लगते हैं जैसे मशहूर गीत का दोहराना जो योगी अपनी पहली गर्लफ्रेंड के घर पर उसके पति और बच्चों की मौजूदगी में गाते हैं। अपनी पानी की बोतल भी योगी से ना शेयर करनेवाली जया क्या अंत में ऐसा कर पाती हैं या दोनों को अपने पुराने साथी और ज़िन्दगी में लौट जाने की प्रेरणा यह सफर दे जाता है,जानने के लिए फिल्म देखने का आईडिया बुरा नहीं है। ऑलमोस्ट मुकम्मल वाली फीलिंग भी आ सकती है। 


Friday, November 10, 2017

पद्मावती, जोधा-अकबर आखिर तकलीफ क्या है?

रानी पद्मावती और तोता हिरामन : तस्वीर गूगल से ही मिली 

स्त्री अस्मिता से जुड़ी विरासत हम सबकी साझी है किसी एक समुदाय की नहीं। पद्मावती  केवल एक फिल्म है कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं। विरोध का ऐसा शोर बरपा है कि जैसे संजय लीला भंसाली कोई फिल्म  नहीं ला रहे  बल्कि इतिहास बदलने जा रहे हों। फिल्म जोधा-अक़बर के साथ भी यही हुआ। फिल्म को राजस्थान में रिलीज़ ही नहीं होने नहीं दिया गया। आज घर- घर में टीवी पर ,इंटरनेट पर देखी जाती है। पहले देखो और फिर जो गलत नज़र आए उस पर गोवारिकर या भंसाली को दृश्यवार फटकार लगाओ।  ये विरोध कम  फिल्म को प्रचार देना ज़्यादा मालूम होता है। राजस्थान में पद्मावती को लेकर राजपूत और राजसी समुदाय तल्ख़ नज़र आ रहा है। तोड़-फोड़ की आशंका को देखते हुए यहाँ के वितरक भी फिल्म को  रिलीज़ नहीं करना चाह  रहे। शूटिंग के दौरान ही भंसाली करनी सेना के थप्पड़ खा चुके हैं। अहम् सवाल यही है कि हमें इन विषयों पर ही एतराज़ है या वाकई हमारा इतिहास से कोई लेना-देना है। 
फिल्म को अनावशयक तूल देने की इस कवायद में आइये जानते हैं  सूफी संत कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने क्या कुछ बयां किया है। उनसे  जो किसी ने कहा होता कि आप पद्मावत लिखने से पहले यहाँ-वहां पढ़ाइये तो क्या हम पद्मावत का सुदंर काव्य पढ़ पाते? इसी महाकाव्य में रानी पद्मावती के सौंदर्य और राजा रत्नसेन के प्रेम की दिव्यता का भी उल्लेख है। जायसी ने पद्मावत (1540  ) में इतिहास और कल्पना, लौकिक और अलौकिक का ऐसा सुंदर सम्मिश्रण किया है कि कोई दूसरी कथा इस ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकी है। जायसी के काव्य में रानी पद्मावती सिंहल देश यानी श्रीलंका की राजकुमारी है जिसकी तलाश में रावल रतन सिंह अपनी पत्नी नागमती को छोड़ चल देते हैं। उन्हें पद्मावती का बखान एक तोते हीरामन से सुना था। जायसी ने नागमती विरह को भी काव्य के जरिए जो उपमाएं दी हैं वैसा दुनिया के किसी साहित्य में आसानी से देखने को नहीं मिलता। विरह प्रेम का ही दूसरा नाम है। “कुहुकि कुहुकि जस कोइल रोई। रक्त आँसु घुंघुची बन बोई।।” नागमती की आँखों से आँसू नहीं, खून के बूँदें टपक रही हैं। नागमती दुख के उस पूरे साल का दर्द रचती हैं जब रतनसिंह पद्मावती को पाने के लिए श्रीलंका की यात्रा पर जाते हैं। 
जायसी के मुताबिक पद्मावती जब उनसे मिलने के लिये एक देवालय में आई, उन्हें देखकर वह बेहोश हो गए और पद्मावती उन्हे अचेत छोड़कर चली गर्इं। चेत में आने पर रतनसिंह बहुत दुखी हुए। जाते समय पद्मावती ने उसके हृदय पर चंदन से यह लिख दिया था कि उसे वह तब पा सकेंगे, जब वह सात आकाशों जैसे ऊंचे सिंहलगढ़ पर चढ़कर आएंगे। राजा को जब यह सूचना मिली तो उन्होंने रतनसिंह को फांसी देने का आदेश दिया लेकिन जब उन्हें रतनसिंह की हकीकत मालूम हुई तब पदमावती का विवाह उनके साथ कर दिया।
अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में रत्नसेन के विरोधि पंडित पद्मावती के सौंदर्य का बखान करते हैं और खिलजी उसे पाने के लिए लालायित हो जाता है। चित्तौड़ पर चढ़ाई के तमाम प्रयास विफल रहते हैं तब वह रतनसेन से संधि का धोखा रचता है। खिलजी उन्हें बंदी बना दिल्ली लौटता है। चित्तौड़ में पद्मावती अत्यंत दुखी होकर पति को मुक्त कराने के लिये अपने सामंतों गोरा और बादल के घर जाती हैं। वेे रतन सिंह को आजाद कराने का बीड़ा लेते हैं। सोलह सौ डोलियों में सैनिकों को रख वे दिल्ली की ओर चल पड़ते हैं। वहां पहुंचकर संदेश भेजते हैं कि पद्मावती दासियोंं के साथ सुल्तान की सेवा में आईं है और आखिरी बार अपने पति रतनसेन से मिलने की आज्ञा चाहती हैं। सुल्तान की आज्ञा के बाद डोलियों में बैठे सैनिक रतनसिंह को बेड़ियों  से मुक्त करा भाग निकलते हैं। पद्मावती के साहस से रतन सिंह सुरक्षित चित्तौड़ पहुंच जाते हैं। पद्मावती बताती हैं कि उनकी गैरमौजूदगी में कुंभलनेर के राजा देवपाल ने उन्हें प्रेम-प्रस्ताव भेजा था। राजा इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और लड़ाई में देवपाल को मार खुद भी जिंदा नहीं रह पाते। नागमती और पद्मावती जौहर कर लेती हैं। अगर जो यह कथा सच है तो तकलीफ जौहर से होती है। क्यों कोई प्रेम में यूं खुद को जलाए? विरह में जलने और यूं जलने में ज़मीन-आसमान का फर्क है। 
बरहाल एक फिल्म को फिल्म  जितनी ही इज़्ज़त बख़्शी जानी चाहिए । स्त्री अस्मिता और इतिहास इससे कहीं बड़े हैं। निजी तौर पर मुझे लगता है कि ऐतिहासिक नायक-नायिकाओं के नाम का सहारा लिया गया है तो उसका इतिहास से मेल खाना ज़रूरी है वर्ना कोई और नाम सोचिये और जो तकलीफ़ गंगा जमुनी धाराओं से है तो फिर इसका कोई इलाज नहीं है। फिल्म  तो झांसी की महान रानी लक्ष्मी बाई  पर भी बन रही है। 









































Wednesday, October 25, 2017

फ़िक्र फिर तुम्हारी है

जीवन के इस दौर में
फिर मन करता है
नीली चिड़िया गूगल पर मिली 
तुम्हें पढूं
तुम्हें गुनूं

तुम
हो कहाँ !

रहो तुम
जहाँ रहना है तुम्हें
मुझे पता है
ज़रूरी लोग
अपने पीछे
कुछ भी गैर ज़रूरी नहीं छोड़ते

मेरी गुज़र जाएगी
फ़िक्र फिर तुम्हारी है
मैं ऐसा क्या दे पाईं हूँ
तुम्हें ??

Sunday, September 24, 2017

नूतन का नू बना न्यू और तन बना टन हो गया न्यूटन

नूतन कुमार को अपना ये नाम बिलकुल पसंद नहीं था। दोस्त उसे  चिढ़ाते थे और फिर दसवीं कक्षा में उसने  यह क्रांति कर ही दी।  अपने नाम में से नूतन का नू बनाया न्यू और तन को हटा कर  बना दिया टन, बन गया  न्यूटन , न्यूटन कुमार। 

 न्यूटन को ऑस्कर के लिए बेस्ट  विदेशी फिल्म की श्रेणी में भारत से  भेजा जा रहा है। फिल्म बर्लिन से तो सम्मान ले ही आई है क्या पता ऑस्कर भी जीत लाए। वैसे इसकी उम्मीद मुझे कितनी लगती है यह बाद में लिखूंगी लेकिन पहले फिल्म पर लगे इलज़ाम की बात कि  यह एक ईरानी फिल्म सीक्रेट बैलट की कॉपी है जिसके बारे में निर्देशक ने बड़ी मासूम सी कैफ़ीयत दी है कि सब कुछ पहले ही लिखा जा चुका है।  निर्देशन से ठीक  पहले यानी जब मैं सब  लिख चुका था तब मुझे  पता लगा कि ऐसी एक फ़िल्म है। 
    बहरहाल  सीक्रेट बैलट मैंने देखी  नहीं है, हो सकता है वह न्यूटन से  भी बेहतरीन हो लेकिन जो भारतीय समाज का लहजा और  मुहावरा न्यूटन ने पकड़ा है वह ईरानी फिल्म का नहीं हो  सकता। खासकर पहला भाग तो कमाल है जब निम्न मधयम वर्ग परिवार का न्यूटन लड़की देखने जाता है। जिस तरह से अंकिता जिसे देखने के लिए न्यूटन  परिवार आता है , उसका कशीदा किया कुशन हर सदस्य के हाथों से गुज़रता है और चाय लाने के बाद जब वह बताती है कि वह केवल नवीं कक्षा तक पढ़ी है, न्यूटन अवाक रह जाता है। अगला सवाल हॉबीज को लेकर होता है जब वह कहती है 'पिक्चरें' देखना और अपनी फेवरेट मूवी का नाम साजन चले ससुराल बताती है तो न्यूटन तो और भी हक्का-बक्का । जब न्यूटन अंकिता की उम्र पूछता है तो वह 16 बताती है और फिर तो न्यूटन वहां से उठ खड़ा होता है। वह साफ़ कहता है लड़की नाबालिग है और यह गलत है। यह शादी नहीं कर सकता।  माता-पिता लाख समझाते हैं कि एक तेरी डिग्री कम है  क्या चाटने को जो उसकी भी चाटेगा।  पढ़ी-लिखी लड़की तेरी माँ के पैर  थोड़ी दबाएगी। दस लाख रूपए दे रहे हैं और मोटर साइकिल। 

खैर अब न्यूटन का किरदार स्थापित हो चुका है कि वह कायदे के खिलाफ कुछ नहीं करेगा। वह एक पोलिंग अफसर है और जल्दी ही उसे छत्तीसगढ़ के नक्सली क्षेत्र में फ्री और फेयर चुनाव कराने जाना है। प्रशिक्षण के दौरान उसका प्रशिक्षक (संजय मिश्रा छा  जाते हैं ) उससे पूछता है कि भैया बड़े बोझ वाला नाम रख लिए हो और सारी उम्र अब इसे ढोना पड़ेगा।  तुम्हारे इस नाम में घमंड झलकता है, ईमानदारी का घमंड।  इसमें घमंड किस बात का, पूरा हिंदुस्तान इसे सहज भाव से करने लगे तो देश में कोई समस्या ही न हो। ऐसे कई दृश्य हैं न्यूटन में जब  दर्शक एक ही समय में  हँसता भी है तो कभी तीखे व्यंग्य में चुभती सुइयाँ  भी महसूस करता है। पीपली लाइव यहाँ खूब याद आती  है। 

      बंदूकों के साए में रघुवीर यादव जिनकी नौकरी का बमुश्किल एक साल बाकी है , न्यूटन के साथ हेलीकॉप्टर से नक्सली प्रभावी एरिया में उतार दिए जाते हैं। पंकज त्रिवेदी एक पुलिस ऑफिसर के रोल में हैं जो न्यूटन को कहते हैं कि आप आराम करो, वोट हम करा देंगे लेकिन वह भला कहाँ माननेवाला था।  बंदा पूरे कायदे से चुनाव कराने के वादे  के साथ सख्त सुरक्षा के बीच सदल चल देता है मतदान केंद्र की ओर। वहां एक टीचर उन्हें स्थानीय मददगार के तौर पर मिलती है जिसे भी पुलिस अफसर साथ नहीं लेना चाहते क्योंकि उनका मकसद कैसे भी कर के इस ज़िम्मेदारी को निपटा-भर देना  है।  उन्हें डर है की यह स्थानीय आदिवासी लड़की  उनकी मुश्किल बढ़ा सकती  है। रघुवीर यादव के ज़िन्दगी के तजुर्बे मज़ेदार हास्य गढ़ते हैं , मसलन वे टीचर मलकु  से पूछते हैं आप आशावादी हैं या निराशावादी तब वह कहती है मैं आदिवासी हूँ। आदिवासी क्षेत्रों में मलेरिया  का प्रकोप सर्वाधिक होता है जहाँ के मोटे-मोटे  मच्छर महामारी बनकर उन्हें मौत के घाट उतार देते हैं। टीचर रघुवीर यादव उर्फ़ लोकनाथ जी को चीटियां खाने का आग्रह करते हुए कहती  है कि हमारे यहाँ के  मच्छरों पर आपके इलाज काम नहीं आएंगे। बहरहाल रास्ते में जले हुए घर हैं जो पुलिस ने जलाए हैं ताकि आदिवासियों को यहाँ से खदेड़ा जा सके। वे केम्पों में शरणरार्थी बनाकर छोड़ दिए गए हैं जहाँ उन पर पुलिस अत्याचार करती है और नक्सली हमला।  पुलिस जो नक्सलियों से मुकाबले के लिए आदिवासियों का इस्तेमाल कर रही है और नक्सली जो हथियार के ज़ोर पर अपनी जनताना सरकार कायम करना चाहते हैं।ये आदिवासी दोनों तरफ से मार झेल रहे हैं। देश में ही कई तरह के शरणार्थी हमने बना दिए हैं  लेकिन बात केवल रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की होती है। यहाँ पत्रकार ह्रदयेश जोशी  की लिखी किताब लाल लकीर ज़्यादा असरकारक है जो आदिवासी शिक्षिका भीमे कुंजाम के ज़रिये बस्तर के आदिवासियों के शोषण की पूरी कथा शिद्दत से कहती है। 
फिल्म पर लौटते हैं। भारतीय सिनेमा  बदल रहा है, यह भी न्यूटन को देखकर पता चलता है। दृश्यों की चुप्पी आप महसूस करते हैं। जंगल अपने आप में मज़बूत किरदार होता है। सभी कलाकार रचनात्मक और ओरिजिनल मालूम होते हैं । श्रेय निर्देशक अमित मसूरकर को जाता है 
 आदिवासी टीचर की भूमिका में अंजलि  पाटिल बहुत बेहतर हैं। उनका पाटिल उपनाम महज़ संयोग हो सकता है लेकिन स्मिता पाटिल की याद दिलाता है।  कॉमिक अंदाज़ में न्यूटन चोट करती है लेकिन मानस पर गंभीर घाव करने से थोड़ी चूक भी जाती है। राजकुमार राव बरेली की बर्फी के बाद लगातार बेहतरीन बने हुए हैं। आखिर में फिल्म का वह संवाद  कि न्यूटन ने सब एक कर दिया अमीर-गरीब,छोटा-बड़ , राजा-रंक, ज़मीन -आसमान, इससे पहले दुनिया खेमों में बंटी हुई थी। अम्बानी गिरे या चायवाला सब एक साथ मरेंगे। न्यूटन नाम रखते ही फिल्म से भी ज़्यादा ग्रेविटी  की अपेक्षा हो जाती है जिसमें काफी हद तक वह कामयाब भी है। 

Tuesday, September 19, 2017

रेंकने वाले प्राणी की चहचहाहट


गधे की तस्वीर के साथ आए एक ट्वीट के बाद गधों की दुनिया में हलचल मच गई है :-) 


इन दिनों गधों की हज़ार सालों  की  सहनशीलता दाव पर है। सब उन्हीं  पर जुमले  बोल रहे हैं।  गधा पचीसी , धोबी का गधा न घर का ना घाट का , गधे की पहलवानी और दुलत्ती तो याद आई ही मुल्ला नसरुद्दीन ,चचा ग़ालिब और चाचा नेहरू भी जीवंत हो  गए  हैं। भला हो रेंकने वाले उस प्राणी से जुड़ी  चहचहाहट का बोले तो  उस ट्वीट का जिसने गधे पर जुमलों और किस्सों -कहानियों का पिटारा खोल कर रख दिया है।  मामला  बहुत जल्दी गधे के  सींग-सा होने वाला भी नहीं लग रहा है। 
              मुल्ला नसरुद्दीन अपने गधे को खूब इज़्ज़त देते थे।  चचा ग़ालिब को आम के स्वाद से बेइंतहा मोहब्बत थी। वे अपने मुग़लिया बर्तनों में उन्हें भिगो-भिगो कर उनका रस लेते थे। एक दिन इसी रसपान  के दौरान उनके दोस्त  आ पहुंचे। चचा ने आम के लिए  आग्रह किया तो उन्होंने अरुचि ज़ाहिर कर दी।  इतने में  आम की कुछ सौग़ात गधों को  भी परोसी गई, उन्होंने भी मुँह फेर लिया। चचा के मित्र ने इठलाकर कहा देखा -" गधे भी नहीं खाते। " चचा कब चूकने वाले थे तुरंत कहा-'' गधे ही नहीं खाते।"
          बहरहाल यादों के तूफ़ान में चाचा नेहरू भी शामिल कर लिए गए  हैं। पंडित नेहरू को डॉ लोहिया ने क्या-क्या नही कहा , लेकिन कोई दूरी या दरार दोनों  के बीच नही आई । शंकर कार्टूनिस्ट ने पंडित नेहरू को गधा बनाया पंडित जी ने  फोन किया - शंकर जी, गधे के साथ एक चाय पीना पसंद करेंगे ? यह आप पर है कि आप गधे को किस तरह लेते हैं। शोर तो मच ही सकता था।  तब शायद व्यंग्य  के लिए जगह थी।  हास्यबोध होता था।  इधर अब हास्य को पचा पाना  इतना मुश्किल हो गया है कि युवाओं को  यू ट्यूब में घुसना पड़ रहा है क्योंकि खुले में तो उनकी कॉमेडी किसी को पचती नहीं। वे कहते हैं यहाँ तो रोज़ पकी-पकाई स्क्रिप्ट मिल रही है। हर तरफ हास्य बिखरा पड़ा है।  बाहर से ला  और यू ट्यूब में डाल। ये युवा मसखरे कहते हैं सियाचिन में हमारे जवान लड़ रहे हैं के नाम पर आम आदमी के जीवन को ही युद्ध बना दिया गया है। अब ऐसा अगर बाहर बोले तो ज़ुबां ही  ज़िबह हो जए। नर्म आवाज़  वाली पत्रकार के साथ भी यही हो रहा है। किसको गधा कहा , क्यों कहा ? एक satire है भाई क्यों तुम्हारी समझ में नहीं आता। अब क्या इजाज़त ली जाए इसके लिए भी। वैसे अश्व प्रजाति का गधा बड़ा ही समझदार प्राणी है। कोई तो यहाँ तक कह रहा है जो गधे पर नहीं बैठा वह जन्म्या ही नहीं। 

भक्तजनों के निशाने पर रहनेवाले एक पत्रकार ने कहा कि आज के दिन इस तरह से नहीं चहचहाना था। सालगिरह का लिहाज़ किया जाना चाहिये था। 364  दिन पड़े हैं न, गरियाओ।  ये क्या बात हुई 364 दिन गरियाओ और लतियाओ और एक दिन जिस पर भी दो दिन की दुविधा है उस दिन माला पहनाओ, बत्तीसी दिखाओ। गधे की तस्वीर मत लगाओ ये क्या तर्क हुआ भला ? मैं पिछले महीने सालगिरह के बोझ से गुज़री हूँ। सोच रही हूँ उस दिन मुझे लोग केवल अच्छी अच्छी बातें बोलें और  साल भर मेरी डेश डेश करते रहें तो? ना भई आप 364 दिन मोहब्बत बरसाइये। दे लीजिये एक दिन डेश डेश मैं सह लूंगी। किसने बनाया ये कायदा कि जन्मदिन और मौत का दिन केवल तारीफ के लिए मुक़र्रर है। क्यों नहीं इस दिन भी कोई वही कहे जो वह था या थी। उसके मित्र सगे -सम्बन्धी क्यों झूठ बोलने पर मजबूर हों ?  कोई मेरी मौत पर कहे कि  बड़ी -------- थी तो कहो यार।  मैं कहाँ हूँ सुनने के लिए।  कम अज़ कम जो ज़िंदा हैं वे तो सबक लेंगे। 

         तो अभी  गधा पुराण समाप्तम नहीं है। गधों के तो दिन आए  हैं। आनंदित और रोमांचित होने के। जुमला जयंती आपको लगती होगी उन्हें वादे लगते हैं।  आपकी तकलीफ है। खामखां दूसरों पर इलज़ाम लगाते हो। उनके आनंद और रोमांच से जलते हो। छोटे दिल के। अपना आनंद रचते नहीं। सैडिस्ट कहीं के। खबरदार जो आगे ऐसी बात कही। बंद करो अपनी ज़ुबां या फिर ज़िबह होने के लिए तैयार रहो।  इस नए ट्रेंड को नहीं जानते क्या।  वैशाख नंदन की बात करने वाले। 

Friday, September 1, 2017

अरे ओ बेरंग ज़रा देख रंगों का कारबार क्या है


नोटबंदी से नोटजमा  तक का व्यंग्यात्मक खाका 
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पांच सौ का पुराना नोट दराज़ में जमे अख़बार के नीचे से निकल-निकल कर मुँह चिढ़ा रहा था और दूसरा उस लाल बक्से में से जी दीपावली की पूजा के बाद चांदी के दो सिक्कों के साथ बंद हो गया। .... और हज़ार और पांच सौ के वे दो नोट भी जो  बेटे ने अपने मुद्रा संग्रहालय के लिए ज़बरदस्ती रख लिए थे। तो कितने हुए ? कुल जमा ढाई हज़ार रुपए। अरे नहीं मैं भूल कर  रही हूँ। पांच सो का एक नोट और है जो बटुए में से निकलते हुए अल्लाह को प्यारा हो गया था यानी फट गया था। । ये तीन हज़ार रुपए का काला-धन  मुझे दो दिन से ठेंगा दिखा-दिखा कर  नाच रहा है कि थोड़ा और ज़्यादा होता तो आतंकवाद, नक्सलवाद और जालीनोट वालों की तो कमर ही टूट गयी होती।
    खैर मज़ाक नहीं यह गंभीर मसला है। पूरे देश ने महीनों अपना सफ़ेद समय इस  काले-धन को उजागर करने में लगाया है। अब क्या करें जो 99 फ़ीसदी धन बैंकों में आ गया है, ये सारा का सारा सफ़ेद थोड़ी है।  इसमें काला भी है ।  आप खामखां लगे हैं सरकार को कोसने में। आपको तो बधाई देनी चाहिए कि  अपने नागरिकों का काला धन सफ़ेद करने के लिए इतनी प्रतिबद्ध और मुस्तैद  सरकार किस देश की होती है ? सब काला आराम से सफ़ेद हो गया। गुलज़ार साहब को पता नहीं की केवल उम्र बरसकर सफ़ेद नहीं  होती, नोट भी बंद होकर सफ़ेद होते हैं। थोड़ी हींग फिटकरी लगी, नए नोट छापने में  भई इतना खर्च तो होगा ही । 
   दरअसल , आपको  दर्द एक नहीं  कई हैं। हमारी माँ ,बहनों, पत्नियों की जमा-पूंजी बेनकाब हुई तो आपको क्या तकलीफ है।  वे सड़कों पर आईं क्या विरोध प्रदर्शन करने के लिए?  भाईसाहब आंदोलन हो जाता आंदोलन अगर उनको तकलीफ होती तो। गलती इनकी ही है।  ये ससुरियां  हमेशा भविष्य की चिंता में नोटों को दबाएं रखतीं।  कभी मर्तबान में, कभी तकिये में और कभी-कभी तो सोना ही गढ़वा लेतीं। इतने पवित्र देश में ऐसी चोरी सांस्कृतिक लज्जा की बात है। ये सब गड़ा धन जब सामने आया तो पति ने कूट भी दिया। क्या करता बेचारा।
     उस दिन मुन्नू  का बापू सुबह से ही चिल्ला रहा था। पिछले साल जब  नई  साइकिल के लिए पैसे मांगे तब कहने लगी नहीं हैं मेरे पास। मुन्नू  की माँ तुमसे तो  भगवान ही निपटेगा। मुन्नू  की माँ ने जैसे ही मुँह खोला कि पिछली बार जब दिए थे, तुम दारू पीकर पड़े रहे थे कित्ते दिन। मुन्नू का बापू उसकी और लपकते हुए चिल्लाया- "ज़बान लड़ाती है, चल निकल यहाँ से , बैंक जा और  नोट बदलवा।" मुन्नू  की माँ बच्चे को लेकर घर से निकल गई  और मुन्नू  का बापू दुखी होकर घर में पसर गया।  उसका मजदूरी के लिए चोखटी पर जाने का टाइम निकल चुका  था। मुन्नू  की माँ  बिना खाए-पिए लगातार कुछ दिनों तक बैंक की लम्बी लाइन में लगती रही। सोच रही थी बहुत दिनों से कोई व्रत नहीं किया था , अब इकट्ठे ही हो गए।  मुन्नू  को बिस्कुट का पैकेट लेकर दे देती थी। कुछ दिनों में पैसे मिल गए लेकिन वह नादान अपनी इस उपलब्धि पर खुश ही नहीं हो पा रही थी। इतने सुंदर करारे जामुनी नोट मिले वह फिर भी दुखी थी। अब उसे कौन समझाता की यह काले नहीं, इस रंगीन धन को देखने का समय  है । काले की बजाय  इसमें छिपी कला को देख। इतने मुड़े-तुड़े नोट के बदले  नए और रंगीन  नोट पाकर भी खुश नहीं होते ये लोग।  कभी किसी का शुक्रिया अदा नहीं करते, इसलिए पिछड़े ही  रहते हैं । नोटबंदी-नोटबंदी कर  रहे हैं। कभी ऐसी नोटबदली की है किसी ने इनके साथ ? भलाई का तो समय ही नहीं रहा। 
  एक और हैं, उनका नाम लाली है। कमबख्त को जब उसके बच्चे  ने आकर नोटबंदी के बारे में बताया तो भागी -भागी पंसारी के पास गई। उसने साफ़ कहा सबका राशन लेना पड़ेगा मैं छुट्टा  नहीं दूंगा। उसे तो पंसारी भगवान मालूम हुआ। देसी घी, आटा, चावल, बूरा सब ले आयी। हज़ार रुपए पूरे। कल की  कल देखेंगे। इस लाली को कौन समझाए। कभी इतना घी खाया था पिछले दिनों। खीर, पूड़ी, हलवा खाकर भी  सरकार को कोस रही है। 
         क्या हुआ जो सौ-सवासो इस अभियान में शहीद हो गए। बाज़ार में पैसा आया है।  लोगों को आसान दरों पर क़र्ज़ मिला है। देश बदलने के लिए शहादत तो देनी ही पड़ती है। आपको अपनी जान की पड़ी है , आपने  प्रधान सेवक की आँख में आसूं नहीं देखे थे क्या? स्वार्थी और निष्ठुर कहीं के।  आपको वो आसूं देखने चाहिए थे। आप सिर्फ  एक ही चश्में से हर चीज़  देखते हैं। आपका कुछ नहीं हो सकता।  ये चश्मा उतारिये पहले। आपको आलोचना में ही आनन्द  आता है। आप देश हित  के बारे में सोच ही नहीं सकते। यही 8 नवंबर की रात से कर रहे हो और अब जब 99 फीसदी पैसा वापस आ गया है तब भी वही कर रहे हो। आपकी समझ ही मोटी है। आप काम-धंधे बंद होने और नौकरी जाने की झूठी बात करते हो। आप देशद्रोही हो। आज का युवा नौकरी देता है करता नहीं। सत्तर सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ। 
दराज़ में रखा वह  500 का पुराना  नोट फिर उछल -उछल कर कह रहा था अरी ओ दृष्टिहीन मैं हरा नहीं काला हूँ।  फेंक दे मुझे। इसे रखना ग़ैर क़ानूनी है।


Friday, August 25, 2017

निजता सर्वोच्च है

वाकई तीन दिन में दो फैसले इंसानी गरिमा को कायम रखनेवाले ही मालूम होते हैं। निजता सर्वोच्च ही होनी चाहिए और कोई भी  एकतरफा मनमानी का शिकार नहीं  होना चाहिए। सब कुछ ठीक रहा तो हम क्या खाएंगे किससे ब्याह करेंगे ये सारे निर्णय हमारे होंगे। एक प्रकार से यह मदद करेगा एक ऐसे समाज को बनाने में जहाँ एक दूसरे का सम्मान हो। यह न्याय, बराबरी और आज़ादी  देनेवाला समाज होगा। इसे किसी भी दल विशेष से जोड़कर देखने के बजाय  मानवीय गरिमा से जोड़कर देखा जाना ही सही होगा। भारत वह देश होगा दुनिया में जहाँ निजता नागरिक का सर्वोच्च हक़ होगा। यह हक़ उसे भारतीय संविधान ने पहले ही दिया भी  है ।  शायद कुछ गलत फहमियां  हो गईं थीं जो अब दुरुस्त  हो जाएंगी। विशेषज्ञ यह भी  मान रहें हैं की इससे धारा 377 को आपराधिक ना मानने की राह भी आसान हो सकती है।  कौन किसके  साथ रहना चाहता है या रह रहा है, उसके लिए वह अपराधी नहीं क़रार दिया जा सकेगा।


Thursday, August 24, 2017

दहेज़ से तीन तलाक़ तक

फ़ैसले के चंद घंटे बाद ही दे दिया तलाक़  
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मेरठ डेटलाइन  से ये ख़बर आज हर अख़बार में प्रकाशित हुई है और उससे पहले तीन तलाक़ के असंवैधानिक हो जाने की सुर्ख़ियों ने हम सबको हर्षाया। बेशक, बेहतरीन, ऐतिहासिक और स्वागत योग्य।  यूं तो दहेज़ लेना भी ग़ैर क़ानूनी है लेकिन कौन परवाह करता है। सब चल रहा है। जब इस ग़ैर क़ानूनी लेन-देन के ख़ुशी-ख़ुशी हो जाने के बाद  कोई समस्या आती है तब सबकी चेतना लौटती है कि देश में दहेज़ के ख़िलाफ़ एक क़ानून भी तो है। यह और बात है कि अपराध जस का तस जारी है लेकिन कानून को ही भोथरा करने की तैयारी पूरी कर ली गयी है । 
         दरअसल  काम कई मोर्चों पर करना है। पहले पहल तो उस मानसिकता का बदलना बहुत ज़रूरी है जहाँ यह कुरीति मान्य है कि लड़की से शादी के बदले हम उससे धन लेंगे और जब मन में आया उसे तज देंगे । परित्यक्ता, छोड़ी हुई जैसे शब्द हमारे ही  समाज के हैं जो कबीलाई सोच को दर्शाते हैं। समस्या को भले ही एक मज़हब, एक समाज या  एक जाति के दायरे में बांध दीजिये लेकिन इसमें  कमज़ोर एक राष्ट्र  ही होता  है। इस मोड़ पर बदलना और संभालना ज़रूरी है क्योंकि फिर एक दिन इतना कुछ बदलेगा कि  हमारी पारिवारिक बुनियाद जिस पर हम फ़ख़्र करते हैं उसकी चूलें ही हिलने लगेंगी । 
    बदलाव के  खाद-पानी से जड़ें सींचीं जानी चाहिए तभी पत्ते हरे होंगे और फूल भी खिलेंगे। 

Tuesday, August 22, 2017

गोरखपुर के बाद रायपुर में O2 का 0 ज़ीरो हो जाना


 जब सरकारों के सरोकार अपने नागरिक की ज़िंदगी को बेहतर बनाने के बजाय उसकी देशभक्ति को नापने और प्रेम पर पहरे लगाने में लगे हों तो तब व्यवस्था की साँसें ऐसे ही टूटती हैं। अभी गोरखपुए की साँसें लौटीं ही नहीं थीं कि रायपुर में भी दम तोड़ गईं। वहां सत्तर यहाँ चार मासूम। कर लीजिये जिन-जिन को बर्खास्त करना है लेकिन जब तक अंतिम ज़िम्मेदारी लेनेवाला इसे महसूस नहीं करेगा तब तक व्यवस्था के प्राण यूं ही निकलते रहेंगे। एक बीमार और अधमरा  हुआ तंत्र दिन ब दिन मृत्यु शैया की और ही बढ़ेगा । 
            इसी छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सरकारी नसबंदी शिविर में 15  महिलाओं की जान चली गयी थी। यहाँ नवंबर 2014 में पांच घंटे में 83 महिलाओं की लेप्रोस्कोपिक सर्जरी कर दी गई थी। कभी माएं  तो कभी बच्चे ये निज़ाम  बस जान लेने पर तुला है। इस बार तो प्रदेश की राजधानी रायपुर के बड़े सरकारी अस्पताल में प्राणवायु ऑक्सीजन की कमी से सांस रुकी हैं। ऑक्सीजन की कमी से जब बच्चे हिलने लगे तब भी नशे में धुत व्यवस्था को क्या होश आना था।  ऑक्सीजन मीटर काफी नीचे था। 

एक बात और जो हैरानी  की सामने आई  है कि मेडिकल ऑक्सीजन पर GST को शून्य की बजाय  1 8 % की श्रेणी में ला दिया  गया है। इंडियन मेडिकल असोसिएशन के अध्यक्ष डॉ के के अग्रवाल के मुताबिक यह असंगत और अन्यायपूर्ण है।  जीवन रक्षक दवाओं को पांच फीसदी के स्लैब में रखा गया है। 
हादसा दर  हादसा क्या वाकई नए निज़ाम से हमें इस बीमार और अधमरे तंत्र में प्राण फूंकने की उम्मीद थी या फिर प्राण वायु ही  ले लेने की???

Wednesday, August 16, 2017

औरत को समझने के लिए हजार साल की जिंदगी चाहिए-देवताले

अब जब महाकवि चंद्रकांत देवताले की देह दिल्ली के एक शवदाह गृह में विलीन हो चुकी है तो फिर क्या शेष है जो हमें उनसे कनेक्ट करता है।  हम  उनके परिवार का हिस्सा नहीं और ना  ही हमारा उनसे रोज़ मिलना-जुलना था। जो जोड़ता है वह है उनकी लेखनी और उनका कवि-मन। वे जब भी लिखते मनवीय संवेदनाओं को स्पंदित कर जाते। ऐसी गहराई  कि कविता एक ही समय में चाँद, सूरज और फिर पूरा  आसमान हो जाती लेकिन फिर भी वे कहते कि मां पर नहीं लिख सकता कविता।क्योंकि मां ने केवल मटर, मूंगफली के नहीं अपनी आत्मा, आग और पानी के छिलके उतारे हैं मेरे लिए।  वे लिखते हैं
 मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को बदला है गिटार में
समुद्र को शेर की तरह आकाश के
पिंजरे  में  खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा
मां पर नहीं लिख सकता कविता

बीती सदी जब ढलान पर थी तभी मेरा परिचय ख्यात पत्रकार शाहिद मिर्ज़ा ने कवि चंद्रकांत देवताले जी से करवाया। साल 95 -96 में वह  इंदौर भास्कर का परिसर  था। बड़े कवि  लेकिन लेकिन बच्चों -सा सहज सरल मन। वह दौर ढलान  का होकर भी बहुत बेहतर था जब अख़बार बेहतर परिशिष्टों के लिए साहित्यकारों, कलाकारों को याद करते थे। पत्रकार  शाहिद मिर्ज़ा साहब इस बात का हमेशा ख्याल रखते कि कैसे नई पीढ़ी को समकालीन रचनाकारों से रूबरू कराया जाए ताकि उनमें  सही समझ और पेशे के लिए सम्मान  का भाव पैदा हो। कभी व्यक्ति से मिलवाकर  तो कभी किताब, कभी कलाकृति भेंट में देकर वे मुस्कुराते हुए सेतुबंध का काम किया करते। इससे पहले मैं भूलूं कि  मैं देवताले  जी को याद कर रही हूँ,  मैं बताना चाहूंगी कि कविता कैसे एक भोले और सच्चे इंसान को नवाज़ती  है इसकी मिसाल थे देवताले जी।  कवि मन होना ही कुछ ऐसा है, दुनिया किसी भी रफ़्तार से बढ़ रही हो आपका इंसानी यकीन कभी नहीं डगमगाता। वह कभी मानवता का साथ नहीं छोड़ता। क्या हुआ जो अंत में शरीर जर्जर  हो रहा हो या याददाश्त किसी बियांबां में भटक रही हो। जो कागज़ पर उतर गया अटल है कायम है। हिंदी कविता को बड़ी ऊंचाई देनेवाला एक कवि ज़िंदा है हमेशा।

डेली न्यूज़ की साप्ताहिक पत्रिका खुशबू को एडिट करते हुए उनकी एक कविता छापकर मैं तो भूल ही गई थी। उन्हें एक छोटा सा चेक गया होगा पत्र की ओर  से। दफ्तर के लैंडलाइन पर उनका कॉल आया।  बच्चों के बारे में पूछा तो  मैंने कहा आपकी एक कविता यमराज की दिशा उनके नौवीं के हिंदी पाठ्यक्रम  में भी है। मैं बच्चों से आपको जल्द मिलवाऊंगी। यह मुलाकात नहीं हो सकी फिर भी बच्चे उन्हें जानते हैं समझते हैं अपने कवि
 से जुड़े हैं।
साल 95-96 की बात होगी। शाहिद मिर्ज़ा साहब को दीपावली को बोनस संस्थान  से मिला था। उन्होंने मित्रो के साथ मिलकर इंदौर में चंद्रकांत देवताले जी का कविता पाठ रखा। देवतालेजी ने बेहतरीन कविताएं सुनाईं। पत्रकार का अपने कवि को यूं सम्मान देना उस शहर की रवायत का हिस्सा रहा होगा शायद। मैं अपनी छोटी बहन के साथ वहां गई थी। पत्रकार और व्यंग्यकार प्रकाश पुरोहित जी भी वहां मिले। देखते ही बोले इसे क्यों बिगड़ रही हो अपने साथ।
चंद्रकांत देवताले  1936 -2017 
देवताले जी के  इंदौर स्थित संवाद नगर घर पर भी जाना हुआ। एक कवि बेहद सादगी के साथ अपने अकेलेपन में भी जीवन की रौशनी रचता है। तभी तो लेखिका स्वाति तिवारी लिखती हैं ,उन्हें निमंत्रण देना मतलब --सबसे पहले सवाल हाँ तो मैं क्या करूंगा आकर ? ये क्या ये ------कौन साहित्य में ? इसको क्यों बुलवा लिया ? फिर कहेंगे अच्छा देखता हूँ ---और फिर अक्सर आते ही ,बाद में कहते अच्छा हुआ कार्यक्रम ,अगली बार फिर बुला लेना मुझे याद रख के ---
  बाद में वे और शांति और सादगी के लिए थोड़ी दूर स्थित महाकाल की नगरी उज्जैन चले गए।  कवि शिव मंगल सिंह सुमन भी यहीं बसते थे। देवताले जी के कविता संग्रह हड्डियों में छिपा ज्वर से एक कवितांश
 फिर भी 
सिर्फ एक औरत को समझने के लिए
हजार साल की जिंदगी चाहिए मुझको
क्योंकि औरत सिर्फ भाप या बसंत ही नहीं है
एक सिम्फनी भी है समूचे ब्रह्मांड की
जिसका दूध, दूब पर दौड़ते हुए बच्चे में 
खरगोश की तरह कुलांचे भरता है
और एक कंदरा भी है किसी अज्ञात इलाके में
जिसमें उसकी शोकमग्न परछाईं 
दर्पण पर छाई गर्द को रगड़ती रहती है 



कवि के बारे में 
चंद्रकांत देवताले (जन्म १९३६) का जन्म गाँव जौलखेड़ा, जिला बैतूल, मध्य प्रदेश में हुआ। उच्च शिक्षा इंदौर से हुई तथा पी-एच.डी. सागर विश्वविद्यालय, सागर से। साठोत्तरी हिंदी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर देवताले जी उच्च शिक्षा में अध्यापन कार्य से संबद्ध रहे हैं। देवताले जी की प्रमुख कृतियाँ हैं- हड्डियों में छिपा ज्वर, दीवारों पर खून से, लकड़बग्घा हँस रहा है, रोशनी के मैदान की तरफ़, भूखंड तप रहा है, हर चीज़ आग में बताई गई थी, पत्थर की बैंच, इतनी पत्थर रोशनी, उजाड़ में संग्रहालय।



Monday, August 14, 2017

छलकाते रहे सिंधु का जल जो उनकी आँखों में था

सभी दोस्तों को आज़ादी की वर्षगांठ बहुत-बहुत मुबारक। आज़ाद होने का एहसास जब सत्तर  सालों  बाद भी हमें यूं स्पंदित कर देता है तो कल्पना  की जा सकती है कि उस दौर का आलम क्या रहा होगा। शायद उस दौर में विभाजन ने हमारी  खुशियों में सुराख़ किया था। मैं उन परिवारों से ताल्लुक रखती  हूँ जो मुल्क के विभाजन के बाद भारत आए। शरणार्थी परिवार। हमारे पुरखों के शब्दकोष में बस एक ही शब्द था संघर्ष। क्या स्त्री क्या पुरुष सबने इसी के आस-पास अपनी ज़िंदगी बुन ली थी।
ज़िन्दगी बढ़ती रही लेकिन इस कौम को किसी के आगे हाथ फैलाना मंज़ूर नहीं था। कठोर परिश्रम से  अपनी ज़िन्दगियों की सूरत बदलने की ज़िद उन्होंने  हमेशा जारी रखी। जारी रखा अपने बच्चों को बेहतर ज़िंदगी देने का संकल्प। किसी से कोई अपेक्षा नहीं। सरकार को  भी हमेशा  झुक-झुक कर इसलिए  धन्यवाद देते रहे कि उन्हें माँ भारती  की गोद  में शरण मिली। इसके अलावा  कोई मांग इस समुदाय  के भीतर मैंने तो नहीं देखी।  क्या उनका अपमान ना  हुआ होगा ? क्या उनकी संस्कृति, उनके स्थानीय भाषा बोलने के अंदाज़ ने उन्हें मज़ाक का बायस न बनाया होगा ?  फिर भी वे दूध में शकर की तरह घुलते रहे। छलकाते रहे सिंधु का जल जो उनकी आँखों में था। पुरखे सिंध को याद करते हुए इन सत्तर बरसों में  बिदा होते रहे। विरसे में छोड़ गए अपने दम  पर अपनी कौम के  कल्याणका मज़बूत इरादा ।  देशहित में  ये वाकई बड़ा योगदान होता है जब एक समाज अपनी मदद के  लिए किसी ओर नहीं ताकता। बुज़ुर्गों को मैंने हमेशा नतशिर ही पाया , इतने विनम्र और व्यवहार कुशल कि बजाय भिड़ने के हर  मामले को  शांति की ओर मोड़ देते। ऐसा आत्मनियंत्रण और संयम शायद सिंधु की ही देन  था। पांच हज़ार साल की सभ्यता के अंश को महसूस करना कोई सादा काम नहीं है लेकिन वह  पुरखों में नज़र आती थी।
विभाजन की कथा में दर्द  के सिवाय  होता भी  क्या है लेकिन सत्तर साल में कोई समाज कितनी  समरसता के साथ कितना आगे बढ़ा यह वक्त उस लेखे-जोखे का भी तो  है। 

Wednesday, May 24, 2017

ये नए किस्म के पत्थरबाज़

ये नए किस्म के पत्थरबाज़ हैं जो इंसानियत को पत्थर मार रहे हैं. रेश रावल, अभिजीत या फिर चेलापति कैसे भूल जाते हैं कि ये स्त्रियों से बात कर रहे हैं।  अपने आक्रामक ट्वीट और खासकर महिलाओं के खिलाफ भद्दी टिप्पिणयां करने के बाद ट्विटर ने गायक अभिजीत भट्टाचार्य के अकाउंट को सस्पेंड कर दिया है।अभिजीत ने अरुंधति को गोली से उड़ा देने की और जेएनयू छात्रसंघ की नेता शहला राशिद पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने लिखा था कि ऐसी अफवाह थी कि शेहला रशीद ने ग्राहक से २ घंटे के पैसे लिए और उसे संतुष्ट न कर सकी। तेलगु कलाकार चेलापति बोले की स्त्रियां बस बिस्तर पर ही ठीक हैं 

वे पिछले चार बरसों से एक बेहतरीन जोड़ा ही नजर आते थे। लव बर्ड्स  का जोड़ा। अब भी कुछ नहीं बदला है ना ही कुछ बिगड़ा है। दोनों के ही जीवन में यही कोई दो-तीन बरसों में समय कुछ बदल-सा गया है। दोनों में से एक को लगता है कि शायद वह तो था ही तंग सोच का पैराकार। ये तो बापू और नेहरू ने इरादतन हमें बड़ी सोच और बड़े सपने देखने की आदत डालनी चाही थी। हमने भी रंग तो बदन पर मल लिया लेकिन भीतर कुछ नहीं बदल सके। किसी ने पानी की बौछारें क्या छोड़ी हम तो पूरे धुल गए। जैसे बस  इस रंगीन केंचुली से मुक्त होने के लिए मौके के इंतजार में थे। यह केंचुली किसी जोड़े के साथी ने भी पहन रखी थी जो उतर गई। दूसरा साथी हक्का-बक्का है कि आखिर सच क्या है जो इतने साल देखा वह या जो अब है वह?
ऐसी कई केंचुलियां अब पीछे छूट रही हैं और लोग अनावृत्त हो रहे हैं। समझ नहीं आता कि क्या सच है क्या झूठ? कभी सोनू निगम तो कभी परेश रावल के जो बयान आते हैं बताते  हैं कि इतनी मधुर आवाज और इतने बेहतरीन अभिनेता के पास बोलने के लिए ऐसी बातें ही क्यों हैं? सोनू निगम ने अजान से चलकर मंदिर, गुरु द्वारे सबको दायरे में बांध दिया और अब परेश रावल ने लेखिका अरुंधति राय को लेकर एक बयान दिया है। परेश रावल ने एक ट्वीट किया, जो कश्मीर में आर्मी जीप से एक युवक को बांधकर घुमाने वाले मामले से जुड़ा है। उन्होंने अपने इस ट्वीट में लिखा है कि पत्थरबाज को जीप से बांधने से बेहतर है कि अरुंधति राय को बांधो। हालांकि ज्यादातर ने इस ट्वीट को हैरान करने वाला और हिंसक बताया है लेकिन इसे रीट्वीट भी खूब किया गया। आपको बता दें अरुंधति अक्सर कश्मीरियों और कश्मीर पर  बोलती हैं। हाल ही उन्होंने कहा था कि भारत कश्मीर में अगर 7 से 70 लाख सैनिक भी तैनात कर दे, तब भी कश्मीर में अपना लक्ष्य नहीं पा सकता। 
हरेक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। अरुंधति राय के बयान की भी होनी थी लेकिन क्या यह वाकई प्रतिक्रिया थी? पत्थरबाज को जीप से बांधने से बेहतर है कि अरुंधति राय को बांधो।  क्या यह हिंसक टिप्पणी नहीं है? या फिर 7 से 70 लाख सैनिक तैनात कर दें, तब भी भारत कश्मीर में अपना लक्ष्य नहीं पा सकता यह हिंसक है? हम में से कई को दूसरी टिप्पणी भी घातक लग सकती है क्योंकि यहां देश का नाम शामिल है। हाल ही में कश्मीरी युवक फारूक अहमद डार को आर्मी की जीप के बोनट से बांध कर घुमाया गया था। इस वीडियो के वायरल होने के बाद आर्मी ने जांच के आदेश दिए। बाद में फारूक  को जीप से बांधने वाले आर्मी के अधिकारी को क्लीन चिट दी गई। इसी संदर्भ में परेश रावल ने लिखा था कि यहां पत्थरबाज को जीप से बांधने से बेहतर है कि अरुंधति राय को बांधो।  जबकि उमर अब्दुल्लाह का ट्वीट कहता है कि  एक युवक को सेना की जीप से इसलिए बांधा गया ताकि पत्थरबाज जीप पर हमला ना कर सकें। परेश रावल पर लौटते हैं एक बेहतरीन अभिनेता और गुजरात से ही भाजपा के सांसद भी। समझना मुश्किल है कि इस दौर में हरेक को अपनी निष्ठाएं नए सिरे से क्यों परिभाषित करनी पड़ रही हैं। 
अरुंधति राय एक लेखिका हैं जिन्हें 1997 में गॉड ऑव स्मॉल थिंग्स के लिए मेन बुकर प्राइज मिल चुका है जो बाद में मामूली चीजों का देवता के नाम से हिंदी में भी प्रकाशित हुआ।जवाब में अरुंधति की शालीन टिप्पणी आई कि अगर मैं किसी विषय पर अपनी राय रख रही हूं और फिर उस पर लोगों की अपनी राय है। आप हर एक से यह उम्मीद नहीं रख सकते हैं कि वो खड़े होकर आपके लिए ताली बजाएंगे।  कोई बात नहीं जो हम अपने लेखक का सम्मान नहीं करते लेकिन कम अज कम अपने तर्क से तो उन्हें खारिज कर सकते है। हिंसा का विरोध ही तो दोनों तरफ का मकसद है। अगर जो परेश रावल को अपनी बात में दम नज़र आता तो यूं अपनी टिप्पणी को खुद ख़ारिज न करते। 
फिर भी लगता है कि  आस्था जाहिर करने की नई आंधी चली है जब पति-पत्नी ही एक दूसरे को नए सिरे से जान अचंभित है तो फिर हम-तुम कौन? इस आंधी को गहरे और बड़े पेड़ ही थाम सकते हैं। कहां है वे?

Thursday, March 2, 2017

गुरमेहर जिस पर गुरु की कृपा हो


गुरमेहर यानी वह जिस पर गुरु की कृपा हो। लेडी श्री राम कॉलेज की छात्रा गुरमेहर से बातचीत के लिए जब तर्क खत्म हुुुुए तो उन्हें सबक सिखाने के लिए दुष्कर्म की धमकी दी गई।  तर्क से बात नहीं बनीं तो दुष्कर्म की धमकी देने को किसी भी नजरिए से कैसे सही ठहराया जा सकता है। वे यह भी कहती हैं कि पाकिस्तान ने नहीं युद्ध ने मारा  है मेरे पिता को। जवाब में उन्हें कहा गया कि यदि उनके पिता जिन्दा होते तो  शर्मसार होते।  फिर कौर कहती हैं मेरे पिता को मुझ पर फख्र होता कि मैं अपने साथियों के साथ आवाज बुलंद कर रही हूं।
क्या वाकई किसी देश के लिए नर्म रवैया रखना देशद्रोह है और क्यों जब बात तर्क से नहीं बनती तो दुष्कर्म का हवाला देकर सबक सीखाने का पैंतरा अपनाया जाता है? दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब पूर्व जर्मनी और पश्चिम जर्मनी के बीच की दीवार टूट सकती है, अमरिका जापान नए समीकरण बना सकते हैं, फ्रांस जर्मनी भी मिलकर नई इबारत लिख सकते हैं  तो ये दो देश क्यों नहीं? कहीं सियासत ही इसकी जड़ में तो नहीं?
   
कल्पना कीजिए कि ऐसे ही जैसे गुरमेहर को ट्रोल किया गया कोई भारत माता की जय के नारे बोलते हुए उनका कुर्ता  फाड़ दे, पत्थर फेंके, कार के शीशे तोड़ दे क्योंकी उन्हीं की पार्टी ने कश्मीर में उस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बना रखी है जिसने पत्थर बाजों को रिहा कर दिया। यह भी कहा कि बुरहान को किसी दूसरी तरह से टेकल किया जा सकता था, आतंकवादियों के जनाजे में शामिल हुए हैं , घर पर शोक प्रकट करने गए हैं तब? क्या यह सही होगा ? जाहिर है प्रजातंत्र में इन सबकी कोई जगह नहीं । यहां बात होनी चाहिए। विचार पर विचार आने चाहिए। तर्क से विवेक से होश ओ हवास के साथ।
शहीद की बेटी तो और भी सम्मानित हो जाती हैं । केवल इसलिए कि उनके विचार आपसे अलग हैं उनकी देशभक्ति की परिभाषा आपसे अलग है वे दुष्कर्म की हकदार हो जाती हैं? मंत्री महोदय बजाय दुष्कर्म का विरोध करने के यह कहते हैं कि किसने इनके दिमाग में जहर भरा है। परेशान गुरमेहर ने फिलहाल दिल्ली छोड़ दिया है। वे अपने घर जालंधर लौट गईं हैं। एक लड़की को हम इतना ही साहस दे पाते हैं कि अगर वह कुछ बोले तो हम उसके वजूद को ही छिन्न-भिन्न कर दें? क्यों एक पल को भी हम यह नहीं सोच पाते कि जिस बेटी ने अपना पिता खोया है, इसके बावजूद वह शांति का संदेश देना चाह रही है तो कोई कारण रहा होगा? हम सिर्फ अपनी नफरत को  हवा देते रहना चाहते हैं? क्या यह बात हमें जरा भी बेचैन नहीं करती?
       गुरमेहर कौर की मां राजविंदर कौर की बात सुनिये  ''मैं कभी नहीं चाहती थी कि मेरी बेटी को कोई बेचारी बच्ची कहे. मैं इस बात को लेकर निश्चिंत थी कि मेरे बच्चे ख़ुद को असहाय महसूस नहीं करेंगे. इनके पिता नहीं रहे लेकिन ये पीड़ित नहीं हैं. मेरे पति कश्मीर के कुपवाड़ा में नियुक्त थे. वह गुल से फोन पर बात करते थे. तब मेरी बेटी ने बोलना शुरू ही किया था.'' राजविंदर ने कहा, ''हमलोगों ने उसे हेलो की जगह वंदे मातरम कहना सिखाया था. तब उसे पता रहता था कि फ़ोन पर उसके पिता हैं. वह हिन्दी फ़िल्म सोल्जर का सोल्जर-सोल्जर गाना गाती थी. उसकी आवाज़ में वह गाना सुनना काफी अच्छा लगता था. जब मेरे पति मुझे चिट्ठी लिखते थे तो वह गुल के लिए एक अलग पन्ने पर चित्र बनाकर भेजते थे.''''जब वह छह साल की थी तो मैंने महसूस किया कि उसके मन में काफी ग़ुस्सा है।  मेरठ में उसने एक बुर्के वाली महिला पर हमला कर दिया था जो माहौल था उसमें उसके मन में यह बात पैठ गई थी कि मुसलमान और पाकिस्तान ने उसके पिता को मारा है।  फिर मैंने उसे समझाना शुरू किया। मैंने उसे बताया कि उसके पिता को युद्ध ने मारा है।  वह उन्हीं बच्चों में से एक है जो अपने माता-पिता को युद्ध में खो देते हैं।  मैं नहीं चाहती थी कि मेरी बेटी प्यार के बजाय नफरत को दिल रख बड़ी हो। ''
उधर क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने भी ट्वीट कर दिया कि तिहरा शतक मैंने नहीं मारा था मेरे बल्ले ने मारा था। एक्टर रणदीप हुड्डा ने ट्वीट में स्माइलीज बिखेर दिए। अब हुड्डा कह रहे हैं मैं तो सेहवाग के जोक पर हंसा था।  उधर रामजस कॉलेज के प्राचार्य का कहना है कि उनका दिल रो रहा है। दरअसल घटनाक्रम इसी कॉलेज से ही प्रारंभ होता है जब एबीवीपी को यह लगा कि यहां छात्र उमर खालिद भी बोलने वाले हैं और पत्थरबाजी हुई।
 गुरमेहर के दादा कंवलजीत सिंह ने कहा है कि गुरमेहर एक बच्ची है और अब ये सब ड्रामा बंद होना चाहिए। सिंह ने कहा कि राजनेताओं को इस बारे में अब बयान देने से बचना चाहिए। सही कह रहे हैं दादाजी। पोती के लिए उनकी चिंता को सर्वाेपरी मानना चाहिए। वे सजा के हकदार हैं जो यूं बेटियों को अपमानित करते हैं। इस हरकत को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय बेहद शर्मनाक हरकत की तरह देखना चाहिए। अगर हम वाकई बेटियों की चिंता करते हैं तो गुनाहगारों को माफी नहीं मिलनी चाहिए। तभी बेटियों का आत्मसम्मान भी बचा रहेगा।

Tuesday, January 31, 2017

विरह में जलने और यूं जलने में ज़मीन आसमान का फर्क है

पूर्व से पश्चिम तक हवाएं कुछ गर्म हैं। सर्द मौसम में ये गर्म हवाएं क्योंकर चल रही हैं? क्यों सब निषेध या ना कहकर ही अपनी मुश्किलों को आसान करना चाहते हैं? क्यों हम अभिव्यक्ति  को थप्पड़ मार रोकना चाहते हैं? मान लिया कि आपको घणा एतराज है कि कोई फिल्मकार रानी पद्मावती को क्रूर अलाउद्दीन खिलजी के सपने में दिखाकर  गलती कर रहा है तो आप थप्पड़ जडऩे के अधिकारी हो जाते हैं? फिर जब थप्पड़ खाने के बाद फिल्मकार यह कहता है कि मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा जिससे आपको तकलीफ पहुंचे तो क्या वाकई बहुत खुश हो जाने वाली बात होगी? जिस मरुधरा के  रंग पूरी दुनिया को आकर्षित करते हैं वहां  क्यों इकरंगी और ऊब से भरी दुनिया की पैरवी हो रही है?
अगर किसी ने ऐसी ही रोक सूफी संत कवि मलिक मोहम्मद जायसी पर लगाई होती तो क्या हम पद्मावत का सुदंर काव्य पढ़ पाते? इसी महाकाव्य में रानी पद्मावती के सौंदर्य और राजा रत्नसेन के प्रेम की दिव्यता का भी उल्लेख है। जायसी ने पद्मावत में इतिहास और कल्पना, लौकिक और अलौकिक का ऐसा सुंदर सम्मिश्रण किया है कि कोई दूसरी कथा इस  ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकी है। जायसी के काव्य में रानी पद्मावती सिंहल देश यानी श्रीलंका की राजकुमारी है जिसकी तलाश में  रावल रतन सिंह  अपनी पत्नी नागमती  को छोड़ चल देते हैं। उन्हें पद्मावती का बखान एक तोते हीरामन  से सुना था। जायसी ने नागमती विरह को भी काव्य के जरिए जो उपमाएं दी हैं वैसा दुनिया के किसी साहित्य में आसानी से देखने को नहीं मिलता। विरह प्रेम का ही दूसरा नाम है।  कुहुकि कुहुकि जस कोइल रोई। रक्त आँसु घुंघुची बन बोई।।” नागमती की आँखों से आँसू नहींखून के बूँदें टपक रही हैं। नागमती दुख के उस पूरे साल का दर्द रचती हैं जब रतनसिंह पद्मावती को पाने के लिए श्रीलंका की यात्रा पर जाते हैं।
   जायसी के मुताबिक पद्मावती जब उनसे मिलने के लिये एक देवालय में आई, उन्हें देखकर वह बेहोश हो गए और पद्मावती उन्हे अचेत छोड़कर चली गर्इं। चेत में आने पर रतनसिंह  बहुत दुखी हुए। जाते समय पद्मावती ने उसके हृदय पर चंदन से यह लिख दिया था कि उसे वह तब पा सकेंगे, जब वह सात आकाशों (जैसे ऊंचे) सिंहलगढ़ पर चढ़कर आएंगे। राजा को जब यह सूचना मिली तो उन्होंने रतनसिंह को फांसी देने का आदेश दिया लेकिन जब उन्हें रतनसिंह की  हकीकत मालूम हुई तब पदमावती का विवाह उनके साथ कर दिया।
अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में रत्नसेन  के विरोधि पंडित पद्मावती के सौंदर्य का बखान करते हैं और खिलजी उसे पाने के लिए लालायित हो जाता है। चित्तौड़ पर चढ़ाई के तमाम प्रयास विफल रहते हैं तब वह रतनसेन से संधि का धोखा रचता है। खिलजी उन्हें बंदी बना दिल्ली लौटता है। चित्तौड़ में पद्मावती अत्यंत दुखी होकर पति को मुक्त कराने के लिये अपने सामंतों गोरा और बादल के घर जाती हैं। वेे रतन सिंह को आजाद कराने का बीड़ा लेते हैं। सोलह सौ डोलियों में सैनिकों को रख वे दिल्ली की ओर चल पड़ते हैं। वहां पहुंचकर संदेश भेजते हैं कि पद्मावती  दासियोंं के साथ सुल्तान की सेवा में आईं है और आखिरी बार अपने पति रतनसेन से मिलने की आज्ञा चाहती हैं। सुल्तान की आज्ञा के बाद डोलियों में बैठे सैनिक रतनसिंह  को बेडयि़ों से मुक्त करा भाग निकलते हैं। रतन सिंह राजपूत सुरक्षित चित्तौड़ पहुंच जाते हैं। पद्मावती बताजी है कि उनकी गैरमौजूदगी में कुंभलनेर के राजा देवपाल ने उन्हें प्रेम-प्रस्ताव भेजा था। राजा इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते और लड़ाई में देवपाल को मार खुद भी जिंदा नहीं रह पाते। नागमती और पद्मावती जौहर कर लेती हैं। अगर जो यह कथा सच है तो तकलीफ जौहर से होती है। क्यों कोई प्रेम में यूं खुद को जलाए? विरह में जलने और यूं जलने में ज़मीन आसमान का फर्क है ये दौर वाकई बेहतर है क्योंकि संविधान इसे गुनाह कहता है।
कविता- कहानी कहने वाले का अपमान क्यों होना चाहिए ?  सिर्फ इसलिए की इससे हमारी आस्था डिगती है। एक फिल्मकार  की क्या बिसात कि वह जनमानस में मौजूद रानी पद्मिनी के सम्मान को डिगा सके।  जो रानी पद्मिनी के नाम पर हमें अपना हितस्वार्थ देखना है तो बात और है। हमारे ध्येय वाक्य ही जब पधारो म्हारे देस से जाने कब क्या दिख जाए हो जाएगा   तो व्यवहार में शामिल भी होगा ही।